डिजिटल दुनिया में फेक एस्ट्रोलॉजर, फेक काउंसलर, फेक एडवाइजर  –  सब कुछ फेक, कितना हकीकत, कितनी धोखाधड़ी !

जब से डिजिटल दुनिया और ई-कॉमर्स व्यापार का विस्तार हुआ है, भारत में धोखाधड़ी की असीमित संभावनाएं बढ़ गई हैं और बन भी गई हैं। बहुत लोगों को ई-कॉमर्स पर दिनभर शॉपिंग करने का नशा चढ़ गया है। इस बहाव में ये बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां न अपने सप्लायर को आइडेंटिफाई करती हैं, न रिकॉग्नाइज। इन पर कोई भी ऑनलाइन रजिस्टर कर ले, और माल बेचने का कॉन्ट्रैक्ट साइन हो जाएगा। इन कंपनियों को कोई मतलब नहीं है कि जो एम्पैनल दुकानदार है, वह प्रोड्यूसर है, मैन्युफैक्चरर है, एक्सपोर्टर है, वह सामान डिलीवरी टाइम पर देगा या नहीं देगा, सामान खराब हुआ तो वापस होगा या नहीं होगा, नहीं करेगा तो कस्टमर को पैसा कैसे मिलेगा।

मेरा स्वयं का भी अमेज़न से एक्सपीरियंस है कि आज से 3 साल पहले जो सामान रिटर्न मैंने किया, उसका पैसा आज तक नहीं आया। थर्ड क्लास क्वालिटी का सामान मुझे मिला। सामान वापस करने में बड़ी मुश्किल हुई और उसका आज तक पैसा नहीं मिला। अमेज़न में सुनने वाला कोई नहीं है। इस बात के सबूत मेरे पास हैं। मेरे जैसे हजारों-लाखों लोग होंगे जो इस तरह की व्यवस्था और धोखाधड़ी के शिकार होते हैं।

यही हालत जितनी भी फूड एग्रीगेटर कंपनियां हैं, उनके साथ है कि घर के कमरे में दो लोग मिलकर जिस भी क्वालिटी का खाना बना रहे हैं, वह खाना बिक जाता है। FSSAI का लाइसेंस, फूड लाइसेंस हिंदुस्तान में किस तरह मिलता है, उसके लिए कोई लिखने की जरूरत ही नहीं है। पैसा दो और जो मर्जी लाइसेंस ले लो, मिल जाता है। खाना बनाने वाला भी जानता है कि वह जो बना रहा है, वह उच्च गुणवत्ता का नहीं है और अगर उसको अपने बच्चों को खाना खिलाना पड़े तो नहीं खिलाएगा। लेकिन उसे अनैतिक सोच से पैसा कमाना जरूरी लगता है क्योंकि उसके खर्च बढ़ चुके हैं और उसे धोखाधड़ी करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। वह जानता है कि वह छोटे स्तर की धोखाधड़ी कर रहा है जो बड़े स्तर पर हो रही है। धोखा खाने वाला व्यक्ति कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करेगा क्योंकि उसे पहले वकीलों से दो-चार होना पड़ेगा और कोर्ट या पुलिस के चक्कर काटने पड़ेंगे, तब उसके मुकदमे का निस्तारण होगा या नहीं होगा, भगवान जाने। पुलिस थाने से मदद मिल जाएगी, यह संभावना आम आदमी के लिए आज भी दुश्वार है। 200 साल पहले भी यही हालात थे  और आज भी स्थिति वैसी ही है, बल्कि और बिगड़ी हुई है। कुछ सुधार की उम्मीदें भी नहीं हैं।

चाहे न्यायिक प्रक्रिया हो, पुलिस प्रशासन हो या सामान्य प्रशासन  –  यह आम आदमी के लिए भारत में बने ही नहीं हैं। यह खास लोगों को प्रोटेक्शन देने के लिए बनाए गए हैं, ऐसी आम धारणा लोगों में है। आम जन में इन संस्थाओं का विश्वास न के बराबर है। जिस भी व्यक्ति का उसके पक्ष में फैसला हो जाता है, वह बढ़-चढ़कर इन संस्थाओं के गुणगान करता है और बेचारा पीड़ित व्यक्ति तो क्या ही बोलेगा, वह तो चोट खाकर चुपचाप पड़ा रहता है।

आज कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की ललक लोगों में पैदा हो गई है। गांव, गली, मोहल्ले की  महिलाओं तक, रील बनाना, अश्लील, आपत्तिजनक, द्विअर्थी  शब्दों का उपयोग करना और अंग प्रदर्शन से पैसा कमाने की चाहत रखना बहुत आम बात हो गई है। अगर पैसा नहीं मिलता है तो डिप्रेशन में चले जाना भी आम हो गया है।  

अभी पिछले हफ्ते ही समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था कि राजस्थान की एक महिला ने सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल किए जाने के कारण आत्महत्या कर ली।

कुछ वर्षों पहले टीवी पर एकता कपूर के सीरियल्स का लगातार बोलबाला था, जिनमें अक्सर एक पुरुष के कई महिलाओं से संबंध या एक महिला के कई पुरुषों से संबंध जैसी कहानियां दिखाई जाती थीं। यह केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि समाज की मानसिक कुंठाओं और असुरक्षाओं को बेहद चालाकी से प्रस्तुत करने का तरीका था। इन धारावाहिकों ने धीरे-धीरे लोगों के मन में शक, असुरक्षा और अविश्वास का बीज बो दिया। हालत यह हो गई कि पति-पत्नी पर शक करने लगे और पत्नी पति पर। आज जो नया दौर टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चल रहा है, वह उससे भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि लगातार दिखाई जाने वाली सामग्री इंसान के सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर रही है। धीरे-धीरे दर्शकों का दिमाग जैसे गिरवी रखा जा रहा है और उन्हें उसी दिशा में सोचने के लिए मानसिक रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है, जैसे किसी व्यक्ति को सम्मोहित यानी hypnotize किया जाता है।

ऐसे ही हर व्यक्ति यह जानने को उत्सुक हो चुका है कि उसका भविष्य कैसा होगा। जिस चीज की डिमांड होती है, उसी तरह के लोग या उत्पाद बाजार में उपलब्ध हो जाते हैं, तो फिर फेक एस्ट्रोलॉजर, काउंसलर, एडवाइजर  भी पैदा हो गए। हमें कैसा खाना चाहिए  –  दिखने में सुंदर हो, ज़ुबान पर स्वाद हो  –  तो उसी हिसाब से बाजारों में नकली खाद्य पदार्थ बनने लग गए।

आज हालात ये हैं कि देसी घी की मिठाइयां, सर्दी में जमती नहीं हैं और गर्मी में पिघलती नहीं हैं। अगर आप रसगुल्ले की बात करें तो ऐसे भुरभुरे बनने लग गए जैसे बुरादे की तरह बिखर जाते हैं। चाशनी के नाम पर उसमें पानी डाला जाने लगा। क्योंकि ग्राहक को  “कम मीठा चाहिए”
अब तो हालत ये हैं कि आम या नींबू का अचार बहुत ज्यादा खट्टा नहीं हो। यह जो हमारी अपेक्षाएं हैं, यही  से बाजार में दुकानदारों को हमारी इच्छा के अनुरूप सामान बनाकर बेचना मजबूरी बन जाता है। और वहीं से शुरू होता है नकली सामान का गोरखधंधा।

उसका असर यह है कि आज हर अखबार विज्ञापनों से भरा हुआ है, हर बड़े अस्पताल में कैंसर सेंटर खुल रहे हैं और कैंसर तेजी से बढ़ता बाजार बन चुका है। हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के बाद अब कैंसर इस देश का सबसे बड़ा रोग बनता जा रहा है।

योग्य डॉक्टरों का अभाव है ,नई जनरेशन डॉक्टर बनना नहीं चाहती और बने तो बहुत सारी विकट समस्याओं का सामना करना पड़ता है  –  लंबा कोर्स, लंबी समस्याएं। इसके बारे में पहले भी एक आर्टिकल, जिसका शीर्षक दिया था – “चिकित्सक: वर्षों की तपस्या, भारी निवेश और समाज की विडम्बना।”

तो इस आभासी दुनिया में सबसे बड़ा आराम है कि आपको कहीं जाना नहीं है, कुछ नहीं करना है। एक कमरे में बैठो, लैपटॉप न भी हो तो मोबाइल पर सारे ऐप मौजूद हैं। सारे अच्छे और बुरे कर्म करने के लिए उसके अंदर परमिशन मौजूद है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे छुरी से सब्ज़ी भी काट सकते हैं और किसी की जान भी ले सकते हैं और आग से रोटी भी पका सकते हैं और किसी का घर भी जला सकते हैं।  वैसे ही आधुनिक डिजिटल संसाधनों का उपयोग या दुरूपयोग करना आप पर निर्भर है। 

आज हमारे जो नैतिक मूल्य हैं, उनका इतना ह्रास हो चुका है, इतना पतन हो चुका है कि हम चंद रुपयों के लालच में किसी को कितना बड़ा नुकसान हो, उसको करने में नहीं हिचकते। यही वजह है कि डिजिटल दुनिया आज आपकी डिमांड पर हर चीज के लिए खड़ी हुई है। आप जो चाहोगे, मिल जाएगा। यदि आप चाहो कि आपको यह आभास हो कि अमावस्या की रात्रि 12:00 बजे आपको दिन का उजाला नजर आए, तो आप ऑनलाइन सर्च मारिए, ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जो आपकी यह तमन्ना पूरी करने के लिए तैयार बैठे हुए हैं।

अब कोई भी सोच सकता है कि यह चीज संभव है? लेकिन क्योंकि आपकी डिमांड है, वह सामान ऑनलाइन  भरा हुआ है। अब तो डिस्क्लेमर लगाना भी शुरू कर दिया है कि “जो भी सूचना हम दे रहे हैं, उसकी सत्यता की हमारी कोई गारंटी नहीं है।” यानी उनके पास जैसा डेटा हजारों लोगों ने भर दिया, उसी में से टॉप रैंकिंग को सॉर्ट आउट करके वह आपके सामने प्रस्तुत कर देता है, बिना यह सोचे कि उसकी सत्यता क्या होगी।

तो मेरा सभी लोगों से अनुरोध है कि डिजिटल और आभासी दुनिया से दूर रहें और अपने घर परिवार, पास-पड़ोस, अपने दोस्त और रिश्तेदारों से संपर्क बढ़ाएं। उनसे मिलना-जुलना बरकरार रखें और जीवन को आज से 30 साल पहले कैसे जिया जाता था, उस तरह जिएँ। यह मोबाइल, यह सोशल मीडिया आपका भला करने वाला नहीं है।

अभी भी प्रिंट मीडिया में जिम्मेदारी का भाव मौजूद है कि वह लिखने से पहले कई बार सोचते हैं और 60-70 प्रतिशत सूचनाएं और जानकारी आज भी उनमें तथ्यपूर्ण तरीके से दी जाती हैं। बाकी उनको भी अखबार चलाना है, तो कई बार बहुत सारी सूचनाएं ऐसी होती हैं जो समाज के दोहन के रूप में पेश की जाती हैं। मैं माफी चाहता हूं क्योंकि उनकी भी अपनी मजबूरियां हैं। लोग अखबार में भी वही पढ़ना चाहते हैं जो उनको पसंद हो, तो प्रकाशक मजबूरी में इस तरह की सूचनाएं भी थोड़ी-बहुत डालते  हैं।

इसलिए अपने लोगों से मिलते-जुलते रहिए, आभासी दुनिया से बाहर निकलिए। नहीं तो आने वाला समय ऐसा होगा जैसे पूरे देश में नशा मुक्ति केंद्र खुले हुए हैं और पिछले 20 से 30 साल से चल रहे हैं, वैसे ही डिजिटल मुक्ति केंद्र भी बहुत तेजी से खुलेंगे। और वह भी ऐसे लोग खोलेंगे जो डिजिटल दुनिया में ही उसका प्रचार-प्रसार करेंगे। यानी आप डिजिटल दुनिया में ही फंसे रहेंगे उनको ढूंढने के लिए, और डिजिटल माध्यम से ही उनसे ऑनलाइन काउंसलिंग लेंगे और डिजिटल माध्यम से ही डिटॉक्स करने का ट्रीटमेंट लेंगे और अंततः आप डिजिटल दुनिया के जाल में ही उलझकर रह जाएंगे। इससे बाहर निकलने का मार्ग भी आपके अपने हाथ में है। केवल आत्मसंयम, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर ही आप इस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

यह आपके अपने लिए सोचने का विषय है। मेरी बातें  आपको अब नहीं तो शायद कुछ वर्षों बाद याद अवश्य आयेंगी।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान

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