एक देश एक पूंजी बाजार  –  समय है बीएसई और एनएसई के विलय का

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एक देश एक पूंजी बाजार  –  समय है बीएसई और एनएसई के विलय का

संभावना है जीडीपी में 2% तक वृद्धि का 

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश की जीडीपी लगातार बढ़ रही है, विदेशी निवेश बढ़ रहा है और आम लोगों की रुचि भी शेयर बाजार की तरफ तेजी से बढ़ी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में करोड़ों नए डीमैट अकाउंट खुले हैं, जिससे यह साफ दिखाई देता है कि अब शेयर बाजार केवल बड़े उद्योगपतियों या शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे शहरों और मध्यम वर्ग तक भी पहुंच चुका है। ऐसे समय में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत को अपने पूंजी बाजार ढांचे में बड़े सुधार की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए?

भारत में वर्तमान समय में दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज हैं  –  बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई)। दोनों ने देश की आर्थिक प्रगति में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। बीएसई की स्थापना वर्ष 1875 में हुई थी और यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज माना जाता है। वहीं एनएसई की शुरुआत 1992 में हुई थी, जिसे भारतीय वित्तीय संस्थानों जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एलआईसी, जीआईसी और आईडीबीआई ने मिलकर स्थापित किया था।

दोनों एक्सचेंजों का योगदान भारतीय निवेश व्यवस्था को मजबूत बनाने में बेहद महत्वपूर्ण रहा है। बीएसई ने भारत में पारंपरिक इक्विटी ट्रेडिंग को मजबूत किया, जबकि एनएसई ने आधुनिक तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम को लोकप्रिय बनाया। एनएसई के आने के बाद भारतीय शेयर बाजार में पारदर्शिता, तेज़ी और आधुनिक तकनीक का विस्तार हुआ।

लेकिन अब समय बदल चुका है। आज भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में यह बहस भी तेज हो रही है कि क्या भारत को “वन नेशन, वन स्टॉक एक्सचेंज” मॉडल अपनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए?

यह सवाल केवल एक प्रशासनिक सुधार का नहीं है, बल्कि भारत की भविष्य की आर्थिक रणनीति से जुड़ा हुआ विषय बन चुका है। अगर भारत अपने दोनों प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों को एकीकृत कर देता है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय सुधारों में से एक माना जा सकता है।

दोनों एक्सचेंजों की वर्तमान स्थिति

अगर निवेशकों की संख्या की बात करें तो बीएसई के पास लगभग 12 करोड़ निवेशक खाते हैं, जबकि एनएसई के पास लगभग 8 करोड़ निवेशक खाते हैं। यानी दोनों एक्सचेंजों का संयुक्त निवेशक आधार बेहद विशाल है।

लिस्टेड कंपनियों की संख्या के मामले में बीएसई काफी आगे है। बीएसई पर लगभग 5,500 से ज्यादा कंपनियां सूचीबद्ध हैं, जबकि एनएसई पर लगभग 2,200 से अधिक कंपनियां लिस्टेड हैं। बीएसई का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स है, जबकि एनएसई का मुख्य इंडेक्स निफ्टी 50 है। इसके अलावा बीएसई 100, बीएसई 500, निफ्टी बैंक, निफ्टी नेक्स्ट 50 और निफ्टी 500 जैसे इंडेक्स भी बाजार में काफी लोकप्रिय हैं।

भारत की लगभग सभी बड़ी कंपनियां  –  जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज, टीसीएस, इंफोसिस, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एसबीआई, एलआईसी, आईटीसी और भारती एयरटेल  –  दोनों एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 1,800 से 2,000 कंपनियां ऐसी हैं जो बीएसई और एनएसई दोनों पर लिस्टेड हैं।

यहीं से “वन नेशन, वन स्टॉक एक्सचेंज” की बहस मजबूत होती है। क्योंकि जब एक ही कंपनी को दो अलग-अलग एक्सचेंजों पर लिस्टिंग बनाए रखनी पड़ती है, तो उसे दोहरी फीस, अलग-अलग अनुपालन प्रक्रियाओं और तकनीकी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। इससे कंपनियों का खर्च बढ़ता है और प्रक्रियाएं जटिल हो जाती हैं।

क्या दो स्टॉक एक्सचेंज रखना जरूरी है?

यह सवाल आज पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। दोनों एक्सचेंजों के बीच काफी हद तक समानताएं मौजूद हैं। दोनों के पास अपना ट्रेडिंग सिस्टम, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन, डेटा सेंटर, तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्मचारियों की टीम और अलग-अलग अनुपालन व्यवस्था है।

ऐसे में यह तर्क दिया जा रहा है कि क्या दो समानांतर व्यवस्थाओं को चलाना आर्थिक रूप से उचित है? या फिर भारत को एक संयुक्त, अधिक शक्तिशाली और केंद्रीकृत “इंडियन स्टॉक एक्सचेंज” की दिशा में बढ़ना चाहिए?

“वन नेशन, वन स्टॉक एक्सचेंज” के संभावित फायदे

1. निवेशकों के लिए आसान व्यवस्था

अगर भारत में एक ही बड़ा स्टॉक एक्सचेंज होगा, तो निवेशकों को अलग-अलग नियमों, प्लेटफॉर्म्स और शुल्क व्यवस्थाओं से नहीं गुजरना पड़ेगा। अभी कई नए निवेशक यह समझने में भ्रमित रहते हैं कि उन्हें बीएसई चुनना चाहिए या एनएसई।

एकीकृत सिस्टम होने से निवेशकों का अनुभव आसान और सरल होगा। छोटे निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा और बाजार में भागीदारी ज्यादा बढ़ सकती है।

2. बाजार में ज्यादा लिक्विडिटी

जब सभी ट्रेडिंग ऑर्डर एक ही प्लेटफॉर्म पर केंद्रित होंगे, तो बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा यह होगा कि शेयरों की खरीद और बिक्री ज्यादा तेज और बेहतर कीमतों पर हो सकेगी।

बाजार में बाय-सेल स्प्रेड कम होगा और वोलाटिलिटी भी कुछ हद तक नियंत्रित हो सकती है। इससे ट्रेडिंग और निवेश दोनों ज्यादा कुशल बनेंगे।

3. कंपनियों के लिए कम खर्च

अभी कंपनियों को दोनों एक्सचेंजों पर अलग-अलग लिस्टिंग फीस, अनुपालन और रिपोर्टिंग सिस्टम का पालन करना पड़ता है। अगर एक ही एक्सचेंज होगा, तो कंपनियों का खर्च कम होगा और वे ज्यादा आसानी से पूंजी जुटा सकेंगी।

विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों यानी एसएमई सेक्टर को इसका बड़ा फायदा मिल सकता है। अभी बीएसई और एनएसई दोनों के अलग-अलग एसएमई प्लेटफॉर्म हैं। एकीकृत व्यवस्था से एसएमई कंपनियों के लिए फंडिंग और लिस्टिंग प्रक्रिया और आसान हो सकती है।

4. तकनीकी लागत में कमी

आने वाले समय में शेयर बाजार पूरी तरह एडवांस तकनीकों पर आधारित होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों पर भारी निवेश की जरूरत होगी।

अगर बीएसई और एनएसई अलग-अलग तकनीकी निवेश करते रहेंगे, तो लागत दोगुनी होती जाएगी। लेकिन एक संयुक्त तकनीकी प्लेटफॉर्म होने से लागत कम होगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।

5. वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत पहचान

अगर भारत के पास एक विशाल और शक्तिशाली स्टॉक एक्सचेंज होगा, तो वह न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE), लंदन स्टॉक एक्सचेंज (LSE) और टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज (TSE) जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों के बराबर खड़ा हो सकता है।

इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा और मजबूत होगा। भारत में एफआईआई और एफडीआई निवेश बढ़ सकता है। साथ ही भारत एशिया के सबसे बड़े वित्तीय केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

6. नियामकीय व्यवस्था में सरलता

अभी कई मामलों में दोनों एक्सचेंजों की प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं। इससे कंपनियों और निवेशकों दोनों को अतिरिक्त अनुपालन करना पड़ता है।

अगर एकीकृत एक्सचेंज होगा, तो नियामकीय निगरानी भी अधिक सरल और प्रभावी हो सकती है। सेबी जैसी संस्थाओं के लिए भी मॉनिटरिंग और डेटा विश्लेषण ज्यादा आसान होगा।

लेकिन क्या इसके नुकसान भी हो सकते हैं?

हर बड़े सुधार की तरह इस मॉडल के सामने भी कुछ चुनौतियां हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर केवल एक ही एक्सचेंज होगा, तो प्रतिस्पर्धा खत्म हो सकती है। अभी बीएसई और एनएसई के बीच प्रतिस्पर्धा की वजह से तकनीकी सुधार और सेवा गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एकाधिकार की स्थिति बनने से शुल्क बढ़ सकते हैं और बाजार में नवाचार की गति धीमी पड़ सकती है। इसके अलावा साइबर सुरक्षा का जोखिम भी बढ़ सकता है, क्योंकि पूरा देश एक ही सिस्टम पर निर्भर हो जाएगा।

इसलिए अगर भविष्य में ऐसा कोई मॉडल लागू होता है, तो सरकार और सेबी को यह सुनिश्चित करना होगा कि पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और निवेशकों के हित पूरी तरह सुरक्षित रहें।

दुनिया के दूसरे देशों से क्या सीख मिलती है?

दुनिया के कई देशों में एकीकृत स्टॉक एक्सचेंज मॉडल सफल रहा है। यूरोप में यूरोनेक्स्ट मॉडल इसका बड़ा उदाहरण है, जहां कई देशों के एक्सचेंजों को मिलाकर एक संयुक्त प्लेटफॉर्म बनाया गया। इससे लिक्विडिटी बढ़ी, लागत कम हुई और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग ज्यादा आसान बनी।

अमेरिका में भले ही कई एक्सचेंज मौजूद हैं, लेकिन वहां एनवाईएसई और नैस्डैक जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स का स्पष्ट प्रभुत्व है। चीन ने भी अपने वित्तीय बाजार को अधिक केंद्रीकृत और रणनीतिक तरीके से विकसित किया है।

भारत जैसे विशाल देश के लिए भी यह मॉडल भविष्य में फायदेमंद साबित हो सकता है, अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाए।

क्या यह सही समय है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि एनएसई अपने आईपीओ की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में भारत को यह तय करना होगा कि वह भविष्य में अपने पूंजी बाजार को किस दिशा में ले जाना चाहता है।

भारत आज डिजिटल पेमेंट, यूपीआई और फिनटेक क्रांति में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। अगर देश ने बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट सिस्टम में बड़े एकीकरण सफलतापूर्वक किए हैं, तो पूंजी बाजार में भी दीर्घकालिक सुधारों पर विचार किया जा सकता है।

निष्कर्ष

“वन नेशन, वन स्टॉक एक्सचेंज” का विचार केवल एक आर्थिक बहस नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य के वित्तीय ढांचे से जुड़ा हुआ बड़ा विषय है।

यह मॉडल निवेशकों के लिए सरलता, कंपनियों के लिए कम लागत, बाजार के लिए अधिक लिक्विडिटी और भारत के लिए वैश्विक वित्तीय ताकत बनने का अवसर प्रदान कर सकता है। हालांकि इसके साथ प्रतिस्पर्धा, साइबर सुरक्षा और नियामकीय संतुलन जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।

लेकिन यह तय है कि आने वाले वर्षों में भारत को अपने पूंजी बाजार को और आधुनिक, पारदर्शी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए बड़े सुधारों पर गंभीरता से विचार करना ही होगा।

हो सकता है कि “वन नेशन, वन स्टॉक एक्सचेंज” आज केवल एक विचार लगे, लेकिन आने वाले समय में यही भारत के वित्तीय भविष्य की नई दिशा भी बन सकता है।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
एडवाइजर, एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान
मेंबर, रोटरी क्लब जयपुर सिटीजन, (RID3056)
suneelduttgoyal@gmail.com

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