क्या बुजुर्गों के सहारे चलेगा भारत या युवाओं के दम पर ?

आज मैं पूरे देश का ध्यान एक ऐसे सामाजिक सरोकार की ओर दिलाना चाहता हूँ, जहाँ अक्सर यह कहा जाता है कि भारत नवयुवकों का देश है। परंतु क्या वाकई ऐसा है? सच यह है कि भारत अब तेज़ी से बुजुर्गों की संख्या बढ़ाने वाले देशों की क़तार में शामिल हो गया है। आने वाले 10–15 वर्षों में हमारे सामने बुजुर्ग आबादी विस्फोटक रूप से बढ़ेगी। यह केवल जनसंख्या का मामला नहीं होगा, बल्कि एक गहरी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्या के रूप में सामने आएगा। सवाल यह है कि क्या भारत भविष्य में युवाओं के दम पर आगे बढ़ेगा या बुजुर्गों के सहारे लड़खड़ाएगा?

युवाओं से छिनी जगहें: बुजुर्गों के लिए नई कुर्सियाँ

दावा यह है कि भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसकी युवा आबादी है। लेकिन व्यवहार में हो रहा यह है कि बड़ी संख्या में रिटायर अफ़सर, नौकरशाह और कॉर्पोरेट अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद भी विभिन्न संगठनों, बोर्डों सामाजिक संस्थाओं,वॉलंटरी ऑर्गेनाइजेशंस, क्लब्स और समितियों में उच्च पदों पर बने रहते हैं। युवाओं को मौका देने की बजाय, वही बुजुर्ग फिर से कुर्सियों पर बैठ जाते हैं।

अनुभव के नाम पर उनकी वापसी को सही ठहराया जाता है, मगर असल में यह प्रवृत्ति नवाचार और नई सोच को रोकने का काम करती है। जब लाखों योग्य और शिक्षित युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है, तब वही पद दोबारा बुजुर्गों के खाते में जाना क्या न्यायसंगत माना जा सकता है? यह युवाओं के लिए बेहद निराशाजनक संदेश है कि यहाँ “कुर्सी” छोड़ने की कोई परंपरा ही नहीं।

हम किस ज्वालामुखी पर बैठे हैं

स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन स्तर में सुधार से बुजुर्गों की औसत आयु बढ़ रही है। यह स्वाभाविक प्रगति है, लेकिन हमारे पास इस बढ़ती आबादी के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। न पर्याप्त अस्पताल हैं, न वृद्ध-आश्रमों की व्यवस्था है, और न ही उचित मूल्य पर ओल्ड एज होम।

हम मानो किसी “ज्वालामुखी” पर बैठे हैं, जो अगले 10–15 वर्षों में कभी भी फट सकता है। अचानक हमें यह अहसास होगा कि युवा आबादी घट रही है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ गई  है। देश का आधारभूत ढाँचा—चाहे अस्पताल हो, नर्सिंग स्टाफ हो या स्वास्थ्य सेवाएँ—सीनियर सिटिज़न्स की इस लहर को सँभालने की स्थिति में बिल्कुल सक्षम नहीं है।

जनसंख्या से जनशक्ति तक—अब उल्टा सफ़र

कभी हमने गर्व से कहा था कि हमारी जनसंख्या ही हमारी जनशक्ति है। लेकिन आज वही जनसंख्या हमारे लिए दबाव का कारण बन गई है। यदि उद्योग-घराने, बिल्डर और सरकार अभी से सतर्क नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में हालत यह होगी कि न तो पर्याप्त मेडिकल सुविधाएँ होंगी और न ही नर्सिंग स्टाफ। सामाजिक असंतुलन मानो किसी “फूटे हुए बर्तन” की तरह बिखरने लगेगा।

श्री मोहन भागवत जी की चेतावनी और भारत का भविष्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत जी का हालिया बयान इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने युवा दंपतियों से तीन बच्चे पैदा करने का आग्रह किया है। पहली दृष्टि में यह विचार हास्य या राजनीति से जुड़ा हुआ लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि यह राष्ट्रहित और भारत के दीर्घकालिक भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

भारत की जनसांख्यिकी के आंकड़े बताते हैं कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) अब 1.9 तक गिर चुका है। जबकि रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 है—अर्थात जितने लोग प्राकृतिक कारणों से समाज से विदा होते हैं, उतने नए जन्म होने चाहिए। यदि TFR लगातार गिरता रहा तो आने वाले दशकों में भारत में युवा कार्यबल की संख्या घट जाएगी और बुजुर्ग आबादी का दबाव बढ़ेगा।

भागवत जी की यह अपील केवल बयानबाजी नहीं है। यह एक गंभीर रणनीतिक सोच का हिस्सा है। यदि भारत को भविष्य में मजबूत राष्ट्र बने रहना है तो सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। केवल “हम दो हमारे दो” जैसी नीतियों से देश को नुकसान हुआ है। अब जरूरत है कि परिवारों को इंसेंटिव दिए जाएं— अच्छी और सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सहयोग, बच्चों के पालन-पोषण में आर्थिक सहायता , तीन बच्चों वाले परिवारों के लिए विशेष योजनाएँ इन प्रोत्साहनों से ही लोगों में यह भावना विकसित होगी कि अधिक बच्चे पैदा करना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा है।

जनसंख्या और सामाजिक चुनौतियाँ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए “जनसंख्या संतुलन” संबंधी बयानों ने एक बहस को जन्म दिया है। प्रश्न उठता है कि आज लोग अधिक बच्चे क्यों नहीं पैदा कर रहे? इसके पीछे मुख्य कारण हैं—

  • वाजिब दरों पर गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य एवं शिक्षा का अभाव
  • आरक्षण व्यवस्था का दुरुपयोग और इससे उत्पन्न असमानताएँ
  • ब्रेन ड्रेन (प्रतिभाशाली युवाओं का विदेश पलायन)

विशेषज्ञ मानते हैं कि आरक्षण के लाभ समाज के एक ही वर्ग तक सीमित रह गए हैं, जिससे समान अवसर का अधिकार प्रभावित हो रहा है। सामान्य वर्ग और अन्य वंचित तबकों में निराशा का भाव बढ़ा है, जिसके कारण भी लोग परिवार नियोजन की ओर झुक रहे हैं।

आरक्षण पर गहरी बहस की ज़रूरत
यह भी कहा जा रहा है कि आने वाले वर्षों में किसी भी सरकार की “हिम्मत और ज़ुर्रत” इतनी नहीं होगी कि वह आरक्षण नीति में बड़े बदलाव कर सके। अनुसूचित जाति और जनजाति में भी केवल कुछ वर्ग ही लगातार लाभान्वित हो रहे हैं। परिणामस्वरूप, एक बार एक व्यक्ति आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी लगने के बाद भी बार-बार पदोन्नति और अवसर मिलने से और उनकी आने वाली पीढ़ियों तक  यह लाभ उनको मिलता रहता है जबकि वास्तव में उन्हीं की जाति के पिछड़े वर्ग में बहुत से ऐसे परिवार हैं जिनको कभी भी सरकारी नौकरी नहीं मिली। इसलिए  अन्य वर्ग के लोग अपने मूल अधिकारों से वंचित महसूस कर रहे हैं।

यह विसंगति भी देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों,संविधान का उल्लंघन है और युवाओं में कभी भी इस बात को लेकर भी आक्रोश भड़क  सकता है या बाकी लोग  या विदेशी ताकतें उनको भडकाने की कोशिश भी कर सकते हैं तो सरकार को भी समय रहते इसमें बदलाव करना चाहिए और चौकस रहना चाहिए |

इसके साथ ही सबसे बड़ा खतरा एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग से है। आप ही सोचिए, कोई 70 वर्षीय व्यक्ति है, जो राजनीति या सरकार  में बड़े पद पर रह चुका है। अगर वह कह दे कि किसी ने अनुसूचित जाति, जनजाति या आदिवासी शब्द का उपयोग किया, तो उसे इतना बड़ा अपराध मान लिया जाता है, मानो जैसे उसने हत्या जैसा अपराध कर दिया हो। इसमें कोई एंटीसिपेटरी बेल का प्रावधान नहीं है और गिरफ्तारी सुनिश्चित है। यानी, परिवादी ने चाहे सच कहा हो या झूठ, सामने वाले व्यक्ति को दबाव में लाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।  यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग  तो है ही साथ ही दूसरे पक्षकार के मानवाधिकारों का हनन भी है जिस पर कोई  भी राजनीतिक दल या न्यायिक प्रक्रिया पुनर्विचार करने का साहस नहीं करता । यदि इसका दुरुपयोग देखें, तो इससे बड़ा शायद ही कोई दुरुपयोग हो।

इसके दुष्परिणाम स्वरूप आज कोई भी व्यक्ति सच बोलने से डरता है। हिंदू समाज में भी दूरियाँ बढ़ गई हैं। हिंदुओं को भी अलग-अलग जातियों में बाँट दिया गया है और उनके ऊपर एट्रोसिटी एक्ट का डर लगाया गया है। यदि कोई सामान्य हिंदू इनसे दोस्ती करता है, संपर्क  रखता है या पास-पड़ोस में रहता है, तो डर के कारण सुकून का जीवन नहीं जी सकता। इस विशेष वर्ग के लोग बीस – तीस साल तक पड़ोस में रहने के बाद भी अपनी मनमर्ज़ी का काम करने या कराने के लिए एट्रोसिटी एक्ट का खास तौर पर दुरूपयोग करने से भी नहीं झिझकते भले ही उनके दशकों पुराने संबंध ख़राब हो जायें। 

यह भी एक बड़ा मुद्दा है कि इसी कारण कुछ समुदाय—विशेषकर सवर्ण जाति के लोग—कम बच्चे पैदा करने पर ध्यान दे रहे हैं या सिर्फ एक ही बच्चा पैदा कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें सरकारी नौकरी या उच्च पद मिलने की संभावना नहीं है।

समाज और धर्म का जुड़ाव
जाति और धर्म को अलग-अलग देखने की प्रवृत्ति ने भी समाज में दूरी बढ़ाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलन और समानता बनाए रखने के लिए धर्म और सामाजिक नीतियों में सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है।

चीन, जापान और दक्षिण कोरिया का सबक

दुनिया के कई देशों ने समय रहते इस खतरे को नहीं पहचाना। चीन ने 1980 में “वन चाइल्ड पॉलिसी” लागू की और अब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। वहाँ जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे आ चुकी है। नतीजतन युवा कामगारों की कमी और बुजुर्गों पर निर्भरता उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। जापान और दक्षिण कोरिया भी इसी संकट से जूझ रहे हैं। भारत को इन गलतियों से सबक लेना होगा और अपनी नीतियों को समय रहते संतुलित करना होगा।

भारत की वर्तमान स्थिति

आज देश के 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहाँ TFR रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। दिल्ली में यह दर 1.2 तक सिमट चुकी है, जबकि बिहार जैसे राज्यों में यह 2.8 है। शहरी क्षेत्रों की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों से कहीं अधिक चिंताजनक है। शहरों में TFR 1.6 तक गिर गया है, जबकि गांवों में यह अभी भी 2.1 के करीब है। यही ग्रामीण समाज आज भारत के जनसंख्या संतुलन को संभाले हुए है।

सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

यह भी ध्यान देने योग्य है कि 1950 से 2015 के बीच हिंदू समाज की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है, जबकि मुस्लिम समाज की दर अपेक्षाकृत अधिक रही है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में अवैध घुसपैठ भी जनसांख्यिकीय असंतुलन का कारण बनी है। यह पहलू राजनीति से जुड़ा हुआ लग सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी देश की स्थिरता उसके सामाजिक संतुलन पर टिकी होती है।

धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ किसी भी देश का जातीय संतुलन बिगाड़ने के लिए पर्याप्त हैं। उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया कभी हिंदू राष्ट्र था, और लेबनान, जिसे मिडल ईस्ट का पेरिस कहा जाता था, आज वहाँ इस्लाम धर्म और आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह वर्तमान हालात देखकर समझा जा सकता है।

यदि भारत में इन दोनों मुद्दों—धर्मान्तरण और अवैध घुसपैठ—पर कठोर नियंत्रण और कार्रवाई नहीं होगी, तो देश का जातीय संतुलन बिगड़ना तय है। जब यह संतुलन जाति या धर्म के आधार पर प्रभावित होगा, तो राजनीतिक भूचाल अत्यंत गंभीर होगा और विदेशी ताकतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सत्ता में दखल देने लगेंगी, जैसा कि हमने पहले अनुभव किया है और जिसके परिणाम आज हम भुगत रहे हैं।

आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ

यदि जन्मदर घटती रही तो काम करने वाले हाथों की कमी के कारण भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। परिणामस्वरूप सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्गों के पालन-पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव बढ़ेगा। छोटे परिवार रिश्तों की पारंपरिक संरचना को भी कमजोर करेंगे। चीन में “चार-दो-एक” मॉडल (चार दादा-दादी, दो माता-पिता और एक बच्चा) इसका स्पष्ट उदाहरण है।

सामाजिक रिश्तों का पतन

समस्या केवल अस्पताल और रोजगार तक सीमित नहीं है। जब औसत आयु बढ़ रही है और परिवार छोटे होते जा रहे हैं, तो सामाजिक रिश्तों का स्वरूप भी बदल रहा है। एक पीढ़ी पहले तक दादा-दादी, चाचा-मामा, बुआ-फूफा परिवार का अभिन्न हिस्सा थे। लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए यह रिश्ते शायद केवल किताबों तक सीमित रह जाएँगे।

नौकरी की कमी और छोटे परिवार मिलकर समाज की जड़ों को खोखला बना रहे हैं। आने वाला भारत केवल इंडिविजुअल्स का देश बन सकता है, जहाँ रिश्ते और सामाजिक ताना-बाना अतीत की कहानियाँ बन जाएँगे।

क्या रास्ता है आगे का?

  1. पोस्ट-रिटायरमेंट पर नीति: ज़रूरी है कि सेवानिवृत्त लोगों की नियुक्तियों पर सीमा तय हो। उन्हें सीधे कार्यकारी पदों पर दोबारा न रखा जाए।
  2. मेंटॉर की भूमिका: वरिष्ठ नागरिकों को सलाहकार के रूप में काम करना चाहिए ताकि अनुभव भी बहे और युवाओं को भी पूरा अवसर मिले।
  3. सुविधाएँ और ढाँचा: सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर वृद्ध स्वास्थ्य सेवाएँ, नर्सिंग स्टाफ और रहने की व्यवस्था अभी से तैयार करनी होगी।
  4. रोज़गार संतुलन: संस्थानों में “पहला अवसर युवा को” सिद्धांत लागू होना चाहिए। इससे युवाओं में विश्वास जगेगा और नवाचार की राह खुलेगी।
  5. जनसंख्या नीति का पुनर्मूल्यांकन: “हम दो हमारे दो” जैसे नारों से आगे बढ़कर अब ऐसे इंसेंटिव दिए जाएँ कि परिवार अधिक बच्चों के लिए प्रेरित हों।

निष्कर्ष: सम्मान की असली परिभाषा

वरिष्ठ नागरिक निस्संदेह देश की पूँजी हैं, लेकिन उनका असली सम्मान बार-बार एक ही कुर्सी पर बैठाकर नहीं बल्कि समाज को मार्गदर्शन देकर होता है। अगर रिटायर लोग अपनी जगह युवाओं को दें और खुद मेंटॉर बनकर दिशा दिखाएँ, तो यही उनकी अगली पीढ़ी के प्रति सबसे बड़ी सेवा होगी।

भारत का भविष्य युवाओं के कंधों पर है। यदि हम उन्हें स्थान और अवसर नहीं देंगे तो यह “नवयुवकों का देश” केवल एक नारा रह जाएगा, हकीकत नहीं।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान
मेंबर, रोटरी क्लब जयपुर सिटीजन (RID3056)
suneelduttgoyal@gmail.com

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