भारत और विशेष रूप से राजस्थान में, ई-रिक्शा चालकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। यह एक ओर आम नागरिकों के लिए रोजगार का एक महत्वपूर्ण साधन बनता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे व्यावसायिक मुनाफे के लिए उपयोग कर रहे हैं। इस प्रथा में, बड़ी संख्या में ई-रिक्शा खरीदे जाते हैं और इन्हें किराए पर चलाने के लिए उपलब्ध कराया जाता है।

ई-रिक्शा खरीदने और उन्हें किराए पर चलाने की इस प्रथा ने एक नया व्यापार मॉडल तैयार कर दिया है। सामान्यतः, एक व्यक्ति 10, 15, 20, या 50 तक ई-रिक्शा खरीद लेता है और उन्हें बड़े पैमाने पर किराए पर देता है। गरीब और बेरोजगार व्यक्ति, जिनके पास खुद का ई-रिक्शा खरीदने के लिए पैसे नहीं होते, वे इन्हें 200 से 500 रुपये प्रतिदिन के किराए पर लेते हैं।

हालांकि, इस प्रथा में कई समस्याएं उभरकर सामने आई हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह व्यापार मॉडल रोजगार की तुलना में व्यावसायिक मुनाफे पर अधिक केंद्रित है। इसे सूदखोरी का एक नया रूप माना जा सकता है, जिसमें उच्च किराए के चलते गरीब चालकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। इसके अलावा, एक ही व्यक्ति या कंपनी द्वारा बड़ी संख्या में ई-रिक्शा का स्वामित्व शहरों में ट्रैफिक जाम का प्रमुख कारण बन रहा है। अधिक रिक्शाओं के चलते सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है, जिससे यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

ई-रिक्शाओं की अधिकता से सड़कों पर यातायात की गति धीमी हो जाती है, विशेषकर व्यस्त बाजारों और शहरी क्षेत्रों में। इस स्थिति ने पैदल यात्रियों और अन्य वाहनों के लिए भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में, ई-रिक्शाओं की लंबी कतारें ट्रैफिक जाम की स्थिति उत्पन्न करती हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

सरकार को इस समस्या का समाधान करने के लिए सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए, जिला परिवहन अधिकारी (डीटीओ) को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे इस प्रकार के ई-रिक्शा के पंजीकरण की स्कैनिंग करें। यदि किसी एक व्यक्ति या पते पर असामान्य संख्या में ई-रिक्शा पंजीकृत पाए जाते हैं, तो उनका पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए। इस प्रकार के कदम उठाकर, न केवल सूदखोरी पर अंकुश लगाया जा सकेगा, बल्कि जरूरतमंद नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ाए जा सकेंगे।

इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने के लिए, ई-रिक्शाओं के लिए विशेष लेन बनाने या समय सीमा तय करने जैसे उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। इस तरह की नीतियों से न केवल ट्रैफिक जाम की समस्या का समाधान होगा, बल्कि यह क्षेत्र एक स्वस्थ और स्थायी रोजगार का स्रोत भी बन सकेगा। सरकार और स्थानीय प्रशासन को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि ई-रिक्शा चालक समुदाय की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके और यातायात व्यवस्था भी सुचारू रहे।

धन्यवाद,
सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक
इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
जयपुर, राजस्थान
suneelduttgoyal@gmail.com

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