प्रमोटरों द्वारा शेयर बेचना: निवेशकों के लिए एक गंभीर चेतावनी

पिछले कुछ समय से भारतीय शेयर बाजार में एक चिंताजनक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कंपनियों के प्रमोटर या तो अपने शेयर गिरवी रख देते हैं या फिर उन्हें बेचकर भारी-भरकम रकम कमा लेते हैं। इन कदमों को ‘कंपनी के हित’ में बताया जाता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? या फिर यह शेयरधारकों को दिया जाने वाला एक भोंडा बहाना है? आम निवेशक के दिमाग में यह सवाल स्वाभाविक उठता है।

अक्सर, प्रबंधन यह दावा करता है कि कंपनी को पूंजी की जरूरत है, इसलिए प्रमोटर ने अपनी निजी होल्डिंग्स गिरवी रख दीं। एक ऐसी धारणा पैदा की जाती है कि देखो, प्रमोटर कंपनी के लिए कितना वचनबद्ध है कि उसने अपनी निजी संपत्ति तक दांव पर लगा दी। यह कहानी इस तरह से गढ़ी जाती है कि आम निवेशक अच्छा महसूस करे और सवाल पूछना भूल जाए।

लेकिन असली सवाल तो यह है कि आखिर कंपनी इतनी मुश्किल हालात में क्यों पहुंच गई कि उसे प्रमोटर के शेयर गिरवी रखने पड़े? क्या कंपनी के ऑडिटर, स्टॉक एक्सचेंज, या उधारदाताओं को इसकी कोई जानकारी नहीं होती? और सबसे बड़ा सवाल, आम शेयरधारक कंपनी से यह पूछने की हिम्मत क्यों नहीं करता कि उसकी कंपनी को पैसों की इतनी जरूरत क्यों आन पड़ी? असल में, प्रमोटर द्वारा गिरवी रखे गये या बेचे गए शेयरों से जो पैसा आता है, वह अगर कंपनी में डेट के रूप में डाला जाता है, तो कंपनी की बैलेंस शीट पर सिर्फ कर्ज़ का बोझ और बढ़ जाता है। एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना, देसी भाषा में कहें तो, ‘झममन की टोपी मम्मन पर से उतारकर किसी अन्य पर डालने’ जैसा है।

हाल ही की एक बड़ी घटना ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइजेज की एक प्रमोटर, श्रीमती सुनीता रेड्डी ने अपनी 3.36% हिस्सेदारी, जिसकी कीमत लगभग 1489 करोड़ रुपए है, बाजार में बेच दी। इसकी वजह कंपनी के कर्ज को चुकाने के लिए बताई जा रही है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि कंपनी कानून (कम्पनीज एक्ट) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि एक प्रमोटर (जोकि एक सम्बंधित पार्टी है) सीधे तौर पर कंपनी का कर्ज चुका सके। ऐसा संभव ही नहीं है कि श्रीमती रेड्डी ने शेयर बेचे और उस पैसे को सीधे कंपनी के कर्ज दाताओं को दे दिया।

तो फिर खेल क्या है? ज्यादातर मामलों में, यही देखने को मिलता है कि प्रमोटर द्वारा शेयर बेचने से जो रकम आती है, उसे कंपनी को एक लोन के रूप में दिया जाता है। फिर इसी लोन के पैसे से कंपनी अपना पुराना कर्ज चुकाती है। मतलब साफ है – एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज ले लिया गया। बस कर्ज देने वाला अब कोई बाहरी बैंक नहीं, बल्कि खुद प्रमोटर है। इससे कंपनी की वित्तीय हालत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, सिर्फ कर्ज का स्रोत बदल जाता है।

अब सवाल यह है कि मार्केट रेगुलेटर सेबी इन सब पर क्यों नहीं रोक लगाता? क्या सेबी सो रही है? क्या उसे कंपनीज एक्ट के नियमों की जानकारी नहीं है? जरूर है। शायद तकनीकी तौर पर यह पूरी तरह से रूल्स का उल्लंघन नहीं है, इसलिए सेबी खामोश है। लेकिन सवाल नियमों का नहीं, नैतिकता और पारदर्शिता का है। क्या यह उचित है? बिल्कुल नहीं।

यह ट्रेंड निवेशकों के लिए एक बड़ा खतरा है। हो सकता है कि कोई प्रमोटर बाजार के मौके को देखते हुए धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी कम कर रहा हो (निकलने की तैयारी में हो), और ‘कंपनी के हित’ का झूठा बहाना बना रहा हो। यह एक गंभीर मामला है, जो आने वाले समय में बड़े स्कैम के रूप में सामने आ सकता है।

हमारा मानना है कि सेबी को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। उसे हर उस कंपनी की जांच करनी चाहिए, जिसके प्रमोटरों ने अपने शेयर गिरवी रखे हैं या हाल में बेचें हैं। यह पता लगाना चाहिए कि शेयर बेचने के पीछे की असली वजह क्या है। क्या यह वजह उचित और निवेशकों के हित में है? निवेशकों को भी सतर्क होने की जरूरत है। आँख बंद करके भरोसा न करें। कंपनी के मैनेजमेंट से सवाल पूछें। अपने हक की लड़ाई लड़ें।

आखिरकार, शेयर बाजार पूरी तरह से विश्वास (ट्रस्ट) और विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) पर ही तो चलता है। अगर यह विश्वास टूटा, तो बाजार का आधार ही हिल जाएगा, जिससे देश की इकोनॉमी को भी गहरा झटका लग सकता है। यह सिर्फ पैसों का खेल नहीं, लोगों के भरोसे और भविष्य का सवाल है।

धन्यवाद,

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड
जयपुर, राजस्थान
suneelduttgoyal@gmail.com

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