सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के वक्तव्य: आचार-संहिता अब अनिवार्य क्यों?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएँ होती हैं – और इन संस्थाओं की साख उनके पदाधिकारियों के आचरण से तय होती है। न्यायपालिका, प्रशासन और आर्थिक नियामक संस्थाएँ देश की रीढ़ मानी जाती हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है, जहाँ सार्वजनिक पदों पर बैठे माननीय और महामहिम व्यक्ति अपने दायित्वों की मर्यादा लांघते हुए ऐसे वक्तव्य और टिप्पणियाँ कर रहे हैं, जिनका दूरगामी और नकारात्मक प्रभाव समाज, न्याय व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

न्यायालयों से बाहर जाती टिप्पणियाँ और गिरती न्यायिक गरिमा

यह एक खुला सत्य है कि हमारे उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीश – चाहे वे सर्वोच्च न्यायालय में हों या विभिन्न उच्च न्यायालयों में – कभी-कभी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ऐसी टिप्पणियाँ कर बैठते हैं जो न तो आवश्यक होती हैं और न ही रिकॉर्ड का हिस्सा बनती हैं। इससे भी अधिक गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब यही न्यायाधीश अदालत से बाहर सामाजिक कार्यक्रमों, सेमिनारों या सार्वजनिक मंचों पर व्यक्तिगत भावनाएँ व्यक्त करने लगते हैं।

भले ही यह अनजाने में हो या जानबूझकर – पर इसका असर न्याय व्यवस्था पर पड़ता है। निचली अदालतों में कार्यरत न्यायिक अधिकारी, विशेषकर मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी, कई बार यह मान लेते हैं कि “ऊपर” से यही संदेश है, और उसी मानसिकता के साथ वे अपने निर्णय देने लगते हैं। यह स्थिति न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता दोनों के लिए अत्यंत घातक है।

न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि फैसला केवल तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर हो – न कि किसी वरिष्ठ की टिप्पणी या भावनात्मक संकेत के प्रभाव में।

स्थानीय नियुक्तियाँ और निष्पक्षता पर प्रश्न

एक और संवेदनशील विषय है न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया। जब कोई वकील वर्षों तक किसी राज्य या ज़िले में प्रैक्टिस करता है और बाद में उसी क्षेत्र में न्यायाधीश बना दिया जाता है, तो यह मान लेना भोलेपन से कम नहीं कि वह अपने पुराने सामाजिक, पेशेवर या व्यक्तिगत संबंधों से पूरी तरह मुक्त रह पाएगा।

न्यायाधीश भी मनुष्य होते हैं। वे भी उसी समाज में रहते हैं, उसी समाज में सेवानिवृत्ति के बाद जीवन व्यतीत करते हैं। यही कारण है कि प्रशासनिक सेवाओं – जैसे केन्द्रीय एवं राज्य सेवाओं  में यह सुनिश्चित किया जाता है कि अधिकारी को उसके गृह ज़िले में पोस्टिंग न मिले। ठीक यही सिद्धांत न्यायपालिका में भी लागू होना चाहिए।

यदि यह माना जाता है कि एक कनिष्ठ न्यायिक अधिकारी अपने गृह क्षेत्र में निष्पक्ष नहीं रह सकता, तो यह मान लेना कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश इससे अछूते रहेंगे – एक स्पष्ट दोहरा मानदंड है।

विशेष अदालतें: समाधान या नई समस्या?

उत्पीड़न से जुड़े मामलों – विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं से संबंधित मामलों – में एक और जटिल समस्या सामने आती है। कई बार जाँच में यह पाया गया है कि शिकायत झूठी या तथ्यहीन थी। इसके बावजूद न तो निर्दोष व्यक्ति को कोई मुआवज़ा मिलता है, न उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा की भरपाई होती है। उलटे, झूठी शिकायत करने वाला व्यक्ति बेखौफ घूमता रहता है।

ऐसे मामलों में यदि शिकायत गलत सिद्ध हो जाए, तो शिकायतकर्ता पर कठोर आर्थिक दंड और दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए। अन्यथा न्यायालयों में मामलों का अंबार इसी तरह बढ़ता रहेगा।

दूसरी ओर, विशेष अदालतों और विशेष न्यायाधीशों की व्यवस्था भी कई सवाल खड़े करती है। जब यह कहा जाता है कि महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई केवल महिला न्यायिक अधिकारी करेंगी, या अनुसूचित जाति-जनजाति मामलों के लिए अलग अदालतें होंगी, तो इसका अप्रत्यक्ष संदेश यही जाता है कि सामान्य न्यायाधीश निष्पक्ष नहीं हो सकते।

यदि न्यायपालिका स्वयं अपने अधिकारियों पर पूर्ण विश्वास नहीं दिखा पा रही, तो आम जनता से भरोसे की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह व्यवस्था सामाजिक विभाजन और मानसिक दूरी को भी बढ़ावा देती है, जबकि न्याय का सिद्धांत समानता पर आधारित होना चाहिए।

आज़ादी के लगभग 80 वर्ष बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अब भी हमें जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर अलग-अलग न्यायिक ढाँचों की आवश्यकता है?

आर्थिक नीतियाँ और गैर-जिम्मेदार वक्तव्य

यह समस्या केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है। लगभग एक दशक पहले भारतीय रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर – जो अब अमेरिका में रहते हैं – अपने कार्यकाल के दौरान एक अलग ही प्रवृत्ति के लिए जाने जाते थे। वे कार्यालय समय में आधिकारिक बयान देने से बचते थे, लेकिन शाम होते ही मीडिया मंचों से अर्थव्यवस्था, उद्योग और विभिन्न सेक्टरों पर टिप्पणियाँ करने लगते थे।  आज भी ये श्रीमान अपने आप को सुर्ख़ियों में बनाये रखने के लिए आये दिन कोई न कोई अनावश्यक बयानबाजी मीडिया में करते रहते हैं चाहे वो गलत ही साबित हों। 

उनके इन बयानों का सीधा असर भारतीय शेयर बाज़ार पर पड़ता था। कई बार शेयरों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। सेबी की जाँचों में यह भी सामने आया कि कुछ वक्तव्यों के तुरंत बाद असामान्य ट्रेडिंग हुई, जिससे अंदरूनी जानकारी (Insider Advantage) के संदेह को बल मिला।

आज भी यह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कुछ नेता और वरिष्ठ अधिकारी किसी सेक्टर या कंपनी पर बयान देकर बाज़ार को प्रभावित कर देते हैं, जबकि इसका खामियाज़ा आम निवेशक भुगतता है।

अनुशासन ही समाधान है

शेयर बाज़ार केवल निवेश का माध्यम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर है। इसके उतार-चढ़ाव करोड़ों लोगों की बचत, मेहनत और भविष्य से जुड़े हैं। इसी तरह, न्यायपालिका केवल फैसले देने की संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास की अंतिम शरण है।

हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाओं में कमी आई है, लेकिन यह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
अतः मेरी सरकार से प्रार्थना है कि वह सभी सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं और अधिकारियों को यह सख्त निर्देश दे कि वे ऐसे कोई सार्वजनिक वक्तव्य न दें, जिनसे शेयर बाज़ार, सामाजिक व्यवस्था, न्यायिक प्रणाली या किसी भी प्रकार की हिंसक अथवा अहिंसक घटना या दुर्घटना को बढ़ावा मिले – क्योंकि आम व्यक्ति इन सब से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार और न्यायपालिका दोनों मिलकर यह सुनिश्चित करें कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई वक्तव्य न दें। एक स्पष्ट, लिखित और सख़्त आचार-संहिता लागू हो – चाहे वह न्यायाधीश हों, नियामक संस्थाओं के प्रमुख हों या राजनेता।

न्याय तभी सार्थक है जब वह निष्पक्ष हो और दिखे भी निष्पक्ष। और अर्थव्यवस्था तभी मजबूत होती है, जब उस पर भरोसा अडिग रहे। यही संविधान की आत्मा है और यही लोकतंत्र की सच्ची परीक्षा।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान

मेंबर, रोटरी क्लब जयपुर सिटीजन (RID3056)
suneelduttgoyal@gmail.com

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