भारत आज स्वयं को विश्वगुरु, आत्मनिर्भर राष्ट्र और वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की बात करता है, लेकिन यदि इन नारों की बुनियाद को परखा जाए तो सबसे कमजोर कड़ी “अनुसंधान एवं विकास (रिसर्च एंड डेवलपमेंट – R&D)” ही दिखाई देती है। यह एक कटु सत्य है कि भारत आज भी अपनी जीडीपी का लगभग 0.6 प्रतिशत ही रिसर्च पर खर्च कर रहा है, जबकि दुनिया के अधिकांश अग्रणी देश 3.5 से 4 प्रतिशत तक का निवेश इस क्षेत्र में करते हैं। सवाल यह नहीं है कि भारत के पास संसाधन नहीं हैं, बल्कि यह है कि क्या भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं में रिसर्च वास्तव में शामिल है?
विडंबना यह है कि हम हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन, अमेरिका या यूरोप की तकनीकी बढ़त पर चर्चा करते हैं, लेकिन यह स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनकी इस बढ़त का मूल कारण “निजी क्षेत्र को खुली छूट और प्रोत्साहन” देना है। भारत में आज भी रिसर्च को सरकारी प्रयोगशालाओं और सीमित सार्वजनिक संस्थानों तक सीमित रखने की मानसिकता हावी है। निजी क्षेत्र को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, मानो नवाचार केवल सरकारी फाइलों और समितियों में ही जन्म ले सकता हो।
यदि चीन का उदाहरण लें, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। चीन न केवल रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर भारी निवेश करता है, बल्कि निजी कंपनियों को “टैक्स छूट, अतिरिक्त डिडक्शन, सब्सिडी, सॉफ्ट लोन और सरकारी खरीद में प्राथमिकता” जैसे कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ देता है। कई मामलों में तो कंपनियों द्वारा रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च किए गए धन का बड़ा हिस्सा अलग-अलग रूपों में उन्हें वापस मिल जाता है। परिणाम यह है कि चीनी कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, ड्रोन टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट सिस्टम और साइबर क्षमताओं में तेज़ी से आगे बढ़ीं।
इसके विपरीत भारत में निजी उद्योग को अक्सर यह संदेश मिलता है कि “आप निवेश करें, जोखिम उठाएं, लेकिन भरोसा और अधिकार सरकार के पास ही रहेगा।” यही कारण है कि देश का प्रतिभाशाली युवा और उद्योगपति अपनी रिसर्च एंड डेवलपमेंट क्षमता का बड़ा हिस्सा विदेशों में इस्तेमाल करने को मजबूर होता है।
रिसर्च पर भारत से 10 गुना ज्यादा खर्च चीन ने किया, अमेरिका को पीछे छोड़ा
ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स-2025 के ताज़ा आँकड़े भारत की अनुसंधान एवं विकास स्थिति की एक मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं। दुनिया भर में कुल रिसर्च एंड डेवलपमेंट खर्च लगभग 2.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है, जिसमें एशिया की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत है। चीन ने लगभग 785.9 बिलियन डॉलर और अमेरिका ने 781.8 बिलियन डॉलर शोध पर खर्च किए, जबकि भारत 75.7 बिलियन डॉलर के साथ शीर्ष-10 देशों में सातवें स्थान पर है। सतही तौर पर यह उपलब्धि उत्साहजनक लग सकती है, किंतु गहराई से देखने पर अंतर स्पष्ट दिखाई देता है – चीन भारत की तुलना में लगभग दस गुना अधिक निवेश कर रहा है। और जब खर्च को जीडीपी के अनुपात में देखा जाता है, तो भारत का निवेश लगभग 0.7 प्रतिशत तक सीमित है, जबकि दक्षिण कोरिया जैसे देश 5 प्रतिशत से अधिक जीडीपी शोध पर व्यय कर रहे हैं। यह अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा और दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता का संकेतक है।
भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट संरचना भी विश्लेषण योग्य है। कुल शोध व्यय का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा सरकार और सार्वजनिक संस्थानों से आता है, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान लगभग 36 प्रतिशत है। इसके विपरीत, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र अनुसंधान का मुख्य वाहक होता है। अमेरिका में बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियाँ, जापान में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग तथा यूरोप में हेल्थकेयर और ऊर्जा क्षेत्र निजी निवेश के माध्यम से शोध को गति देते हैं। भारत में पेटेंट फाइलिंग में वृद्धि – 2024-25 में 68,176 आवेदन – एक सकारात्मक संकेत अवश्य है, और हाल में घोषित एक लाख करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना भी दिशा दर्शाती है, परंतु जब तक जीडीपी के अनुपात में निवेश नहीं बढ़ता और निजी क्षेत्र की भागीदारी संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ नहीं होती, तब तक वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में वास्तविक छलांग कठिन दिखाई देती है। तथ्य यह संकेत देते हैं कि भारत ने प्रगति की है, पर वैश्विक मानकों की तुलना में अनुसंधान-गहन अर्थव्यवस्था बनने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना शेष है।
रक्षा क्षेत्र: समय से पीछे चलती योजनाएं
सबसे चिंताजनक स्थिति रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में दिखाई देती है। हाल ही में परमाणु पनडुब्बी निर्माण जैसी दीर्घकालिक योजनाओं की चर्चा सामने आई, जिनकी पूर्णता वर्ष 2038 के आसपास बताई जा रही है। यह सुनकर किसी भी जागरूक नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि “13–14 वर्षों बाद की दुनिया और युद्ध की प्रकृति कैसी होगी?” क्या तब तक आज की तकनीक प्रासंगिक भी रहेगी?
आज युद्ध केवल टैंक, तोप और पनडुब्बी तक सीमित नहीं है। आधुनिक युद्ध “डेटा, सैटेलाइट, सेंसर, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर नेटवर्क” से लड़े जा रहे हैं। जब तक रक्षा उत्पादन और अनुसंधान में निजी क्षेत्र की पूर्ण भागीदारी को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक भारत समय के साथ कदम नहीं मिला पाएगा। केवल सरकारी संस्थानों के भरोसे रक्षा तकनीक विकसित करने का मॉडल अब पुराना और अप्रभावी साबित हो चुका है।
सैटेलाइट और निगरानी: आंखें कमजोर हों तो ताकत भी बेअसर
चीन ने हाल के वर्षों में सैकड़ों, बल्कि कुछ आकलनों के अनुसार हजारों निगरानी सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य “विजिलेंस, सुपरविजन और इंटेलिजेंस” है। इन्हीं क्षमताओं के बल पर वह अपने रणनीतिक साझेदारों को रियल-टाइम सूचना सहायता देता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि आधुनिक संघर्षों में सूचना की गति ही निर्णायक भूमिका निभाती है।
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी “भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन” ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं, लेकिन निगरानी सैटेलाइट्स के नेटवर्क और निजी भागीदारी के मामले में अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी यदि निजी कंपनियों को खुलकर रिसर्च एंड डेवलपमेंट करने, प्रयोग करने और असफल होने की स्वतंत्रता नहीं दी गई, तो हम केवल उपलब्धियों की गिनती करते रह जाएंगे, क्षमता का विस्तार नहीं कर पाएंगे।
साइबर युद्ध: अदृश्य खतरे की अनदेखी
आने वाले समय का सबसे खतरनाक युद्ध साइबर युद्ध होगा। इसमें न तो सीमा रेखाएं मायने रखेंगी और न ही पारंपरिक हथियार। बैंकिंग सिस्टम, बिजली ग्रिड, संचार नेटवर्क, रेलवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और सैन्य कमांड सिस्टम – सब कुछ एक साथ ठप किया जा सकता है।
“पिछले वर्ष का एक जीता-जागता उदाहरण माइक्रोसॉफ्ट के सिस्टम का फेल होना है। यह चाहे किसी भी प्रकार की त्रुटि से हुआ हो, एक आउटेज हुआ और लगभग पूरी दुनिया काफ़ी लंबे समय तक बाधित रही। इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे, इसकी आज तक किसी को स्पष्ट जानकारी नहीं है। इतने बड़े मुद्दे को न तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने गंभीरता से उठाया और भारत की मीडिया का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।”
भारत के पास दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आईटी पेशेवरों और साइबर विशेषज्ञों में से कई हैं, लेकिन वे या तो विदेशी कंपनियों में काम कर रहे हैं या देश में स्पष्ट नीति के अभाव में सीमित अवसरों से जूझ रहे हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि साइबर सुरक्षा में निवेश कोई वैकल्पिक खर्च नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता है। यहां भी सरकार को पूंजी लगाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि निजी कंपनियों को भरोसा, अधिकार और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।
नीति की कमी या नीयत की?
मूल प्रश्न यही है कि समस्या नीति की है या नीयत की। जब सरकार बार-बार कहती है कि “देश के पास टैलेंट की कमी नहीं है”, तो फिर उस टैलेंट को अवसर देने में संकोच क्यों? रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर टैक्स छूट देना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना और निजी क्षेत्र को रणनीतिक क्षेत्रों में भागीदार बनाना कोई राष्ट्रविरोधी कदम नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में उठाया गया साहसिक निर्णय होगा।
दुनिया का अनुभव यही बताता है कि सरकारें जब नियंत्रक से अधिक सक्षमकर्ता की भूमिका निभाती हैं, तभी नवाचार फलता-फूलता है। भारत को भी यह स्वीकार करना होगा कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट में छूट देना कोई नुकसान नहीं, बल्कि भविष्य में कई गुना लाभ देने वाला निवेश है।
निष्कर्ष: अभी नहीं तो कभी नहीं
यदि भारत आज रिसर्च एंड डेवलपमेंट को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल नहीं करता, यदि निजी क्षेत्र को रक्षा, अंतरिक्ष और साइबर जैसे क्षेत्रों में खुलकर काम करने की अनुमति नहीं देता, तो आने वाले वर्षों में हम केवल दूसरों की तकनीक खरीदने वाले उपभोक्ता बनकर रह जाएंगे। आत्मनिर्भरता का सपना भाषणों से नहीं, बल्कि “अनुसंधान में निवेश और भरोसे की नीति” से साकार होगा।
भारतीय कंपनियों एवं सरकार की स्थिति आज भी यह है कि वे विदेश से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर अधिक भरोसा करती हैं, न कि अपने देश में नई टेक्नोलॉजी के विकास पर। यहीं से एक-दूसरे पर निर्भरता का खेल शुरू हो जाता है। हमें इससे बचना चाहिए, और सरकार को स्वयं यह भली-भाँति मालूम है कि “आने वाले समय में कौन, कब और किसका स्विच ऑफ कर देगा – इसका किसी को पहले से पता नहीं होगा।”
आज निर्णय लेने का समय है। अन्यथा कल इतिहास हमसे यही पूछेगा – जब अवसर था, तब हमने संकोच क्यों किया?
पूरे देश में खेती किसानी के नाम पर “भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद” भारत सरकार का एक सफेद हाथी के रूप में खड़ा हुआ है और सरकारों द्वारा अरबो रुपए हर साल इनके ऊपर खर्च किया जाता है और शायद सरकारी विभागों में अगर जमीन देखी जाए तो इस डिपार्टमेंट के पास तीसरे या चौथे नंबर की सबसे ज्यादा जमीन की मिलकियत हो सकती है और सबसे ज़्यादा कर्मचारी और अधिकारी शायद इस डिपार्टमेंट में होंगे लेकिन इनके द्वारा दिए जाने वाले परिणाम आशाजनक नहीं हैं।
रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान
मेंबर, रोटरी क्लब जयपुर सिटीजन (RID3056)
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