देश में स्वास्थ्य–सुधार और सस्ती दवाओं की उपलब्धता को लेकर प्रधानमंत्री जन औषधि योजना एक ऐतिहासिक पहल मानी गई है। यह योजना उस समय ऐसे वातावरण में शुरू हुई थी, जब भारत में दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं और गरीब–मध्यमवर्गीय परिवारों पर चिकित्सा व्यय एक असहनीय बोझ बन चुका था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मूल भावना थी – दवा एक विलासिता नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है

लेकिन जिस विचार और संवेदनशीलता के साथ यह योजना आकार ली थी, वह आज गंभीर चुनौतियों से घिरी दिखाई देती है। एक तरफ जन औषधि केंद्रों के माध्यम से सरकार गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएँ सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराने का दावा करती है, दूसरी ओर बाजार में 80–90 प्रतिशत छूट पर मिलने वाली संदिग्ध जेनेरिक दवाओं की बाढ़ ने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह संयोग मात्र नहीं लगता; बल्कि एक संगठित प्रयास प्रतीत होता है, जिसका उद्देश्य जन औषधि योजना की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाना है।

जेनेरिक दवाओं की अंधाधुंध छूट – संदेह की पहली कड़ी

आज लगभग पूरे देश में यह दृश्य आम हो चुका है कि मेडिकल स्टोर एमआरपी से 80 या 90 प्रतिशत कम कीमत पर दवाइयाँ देने का दावा करते हैं। सवाल उठता है –
यदि दवा इतनी सस्ती उपलब्ध हो सकती है, तो फिर एमआरपी पर इतना भारी-भरकम मूल्य क्यों अंकित किया जाता है?
क्या यह व्यापारिक असंतुलन है, या एक सुनियोजित धोखाधड़ी?

दिवाली के पटाखों की तरह, जिनका एमआरपी और वास्तविक मूल्य में भारी अंतर होता है, दवाओं का ऐसा व्यवहार गहरी चिंता का विषय है। लेकिन पटाखों से भिन्न, दवा कोई मनोरंजन का साधन नहीं – यह जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा है। इस क्षेत्र में इस तरह का अव्यवस्थित मूल्य–निर्धारण न केवल अनैतिक है बल्कि खतरनाक भी है।

जब सरकारी केंद्रों पर निजी दवाओं की घुसपैठ होने लगे

प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के केंद्रों पर केवल सरकार द्वारा आपूर्ति की गई दवा ही बेचे जाने का प्रावधान है।
लेकिन हाल के महीनों में लगातार शिकायतें सामने आई हैं कि कई जन औषधि केंद्रों पर निजी जेनेरिक दवाएँ बेची जा रही हैं – वह भी ऐसी दवाएँ जो किसी प्रकार की गुणवत्ता जाँच के मानक पर खरी नहीं उतरतीं।

स्थिति यह है कि – 

ग्राहक प्रधानमंत्री के नाम पर भरोसा करके जन औषधि केंद्र पर पहुँचता है, लेकिन उसे ऐसी दवा थमा दी जाती है जिसका न स्रोत स्पष्ट है और न गुणवत्ता। यह न केवल योजना की भावना का अपमान है, बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी है।

प्रधानमंत्री की भावना, प्रशासन की जिम्मेदारी और व्यवस्था की चूक

यह उल्लेखनीय है कि इस योजना की शुरुआत में B-Pharma और D-Pharma युवाओं को रोजगार देने का लक्ष्य भी जुड़ा था। सरकार ने नाममात्र की राशि लेकर दुकानों का पूरा ढांचा उपलब्ध कराया – कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, दवा स्टॉक और केंद्रीकृत सप्लाई।

मैं स्वयं उदयपुर में इस योजना के प्रारंभ का साक्षी रहा हूँ। उस समय राजस्थान के पूर्व मुख्य सचिव श्री सुधांशु पंत जी, जो तब दिल्ली में फार्मा विभाग में जॉइंट सेक्रेटरी थे, ने अत्यंत ईमानदार नीयत और कठोर गुणवत्ता मानकों के साथ यह परियोजना आगे बढ़ाई थी।

लेकिन आज जो हालात बन गए हैं, वे उनकी मूल भावना के बिल्कुल विपरीत हैं।
जिला ड्रग कंट्रोल कार्यालयों की उदासीनता व अकर्मण्यता  इस समस्या को और गहरा कर रही है। और उनकी मिलिभगत से इंकार नही किया जा सकता |

दवा माफिया का फैलता प्रभाव – संगठित नेटवर्क का संकेत

सवाल यह है कि निजी कंपनियों की दवाएँ जन औषधि केंद्रों तक पहुँच कैसे रही हैं?
इसका उत्तर स्थानीय स्तर पर फैली मिलीभगत में छिपा है।

कुछ शहरों में तो यह भी देखा गया है कि –
एक ही व्यक्ति ने 20–25 जेनेरिक दवाओं की दुकानों का नेटवर्क खड़ा कर रखा है, जहां – 

यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गहरे जड़ जमाए माफिया–तंत्र की ओर संकेत है।

यह केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं – यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है

दवाओं की दुनिया में कोई भी गलती मजाक नहीं होती।
गलत सॉल्ट, घटिया गुणवत्ता, या अप्रमाणित निर्माण–स्थल वाली दवाएँ मरीज की हालत सुधारने के बजाय बिगाड़ देती हैं।

जब प्रधानमंत्री जन औषधि योजना जैसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना को ही कमजोर किया जाने लगे, तो यह समझना होगा कि समस्या केवल ‘व्यापारिक प्रतिस्पर्धा’ का प्रश्न नहीं है –
यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य–सुरक्षा का मुद्दा है।

सरकार को क्या करना चाहिए? – स्पष्ट और कठोर नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता

इस स्थिति में सिर्फ सलाह या अपील पर्याप्त नहीं। अब कठोर प्रशासनिक और संरचनात्मक कदम आवश्यक हैं:

1. जन औषधि केंद्रों पर निजी जेनेरिक दवाओं की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध

किसी भी दुकान पर निजी दवा पाए जाने पर उसका लाइसेंस तत्काल निलंबित होना चाहिए।
यह योजना तभी सुरक्षित रह सकती है, जब इसकी परिधि में निजी आपूर्ति शून्य हो।

2. एमआरपी को फैक्ट्री स्तर पर नियंत्रित किया जाए

दवाओं का एमआरपी उत्पादन लागत के अनुरूप और पारदर्शी हो।
बाजार में “80% डिस्काउंट” का खेल तभी खत्म होगा, जब एमआरपी वास्तविकता आधारित हो।

3. सप्लाई चेन का रियल-टाइम डिजिटलीकरण

सरकारी पोर्टल पर हर दवा की एंट्री, निकासी, बैच नंबर और खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड अनिवार्य हो।
यह पारदर्शिता निजी दवाओं की घुसपैठ स्वतः रोक देगी।

4. जिला ड्रग कंट्रोल विभाग की जवाबदेही तय हो

निरीक्षण, कार्रवाई और शिकायतों का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड जारी हो।
जहाँ लापरवाही दिखे – वहाँ तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई हो।

5. निजी कंपनियों की अवैध सप्लाई पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएँ

यह महज नियम उल्लंघन नहीं – यह सरकारी योजना को निष्प्रभावी करने की साजिश है।
इस पर दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए।

6. दवा बिक्री के लिए योग्य फार्मासिस्ट अनिवार्य हों

दवा जनता की जान से जुड़ा विषय है;
अयोग्य स्टाफ के हाथों इसे सौंपना अपराध की श्रेणी में आना चाहिए।

7.अमानक या नकली दवा के कारोबार में लिप्त या उनको संरक्षण देने वालों या उनको बचाने वालों को मृत्युदंड का कानून बनाना चाहिए क्युकी वो लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं |

प्रधानमंत्री जन औषधि योजना को बचाना केवल सरकार नहीं – पूरे समाज की जिम्मेदारी है

यह योजना उस समय एक आशा का दीपक बनी थी, जब देश का आम नागरिक दवा के लिए आर्थिक संघर्ष झेल रहा था।
आज जब निजी कंपनियों की मिलीभगत, प्रशासनिक लापरवाही और माफिया–तंत्र इस योजना की जड़ों को कमजोर कर रहे हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार निर्णायक कदम उठाए और व्यवस्था में कठोर पारदर्शिता सुनिश्चित करे।

प्रधानमंत्री जन औषधि योजना केवल “सस्ती दवाओं की योजना” नहीं है – यह जनता की स्वास्थ्य–सुरक्षा, पारदर्शिता और विश्वास का प्रतीक है।

इसे बचाना, सुदृढ़ करना और माफिया–प्रभाव से मुक्त रखना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
RID3056
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड
जयपुर, राजस्थान
suneelduttgoyal@gmail.com

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