कश्मीर घाटी की स्थिरता और दीर्घकालिक शांति के लिए सबसे बड़ा प्रश्न केवल सुरक्षा या आर्थिक विकास का नहीं है — बल्कि वहां की जनसांख्यिकीय संरचना (Demographic Structure) का है। जब तक घाटी में जनसंख्या का सामंजस्य नहीं स्थापित किया जाता, तब तक किसी भी योजना या नीति की सफलता अधूरी ही मानी जाएगी।

1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ, वह भारत के स्वतंत्रता के पश्चात सबसे भीषण सांप्रदायिक नरसंहारों में से एक था। मस्जिदों से खुलेआम धमकियाँ दी गईं, गैर मुस्लिम लोगों के घरों पर हमले हुए, बहन-बेटियों की इज्ज़त लूटी गई, उनका सरेआम कत्लेआम किया गया, नरसंहार किया गया, लूटपाट की गई, उनको जमीन जायदाद और अपने घरों से बेदखल किया गया और इतना वीभत्स नरसंहार हुआ कि आज उसकी कल्पना मात्र से भी दिल कांप उठता है और पूरा का पूरा समुदाय अपनी ही ज़मीन से दर-ब-दर कर दिया गया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगे उन अस्थायी कैंपों से लेकर आज भी विस्थापन का दर्द झेलते परिवारों तक — यह घाव आज भी हरा है। द कश्मीर फाइल पिक्चर में इसके अंश लोगों ने देखे हैं और वह उससे कल्पना कर सकते हैं, अनुमान लगा सकते हैं की फिल्म में जो अंश दिखाए गए उससे कई गुना अधिक उनकी भयानकता थी
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घाटी में पहले कश्मीरी पंडितों, सिखों और अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों की उल्लेखनीय उपस्थिति और उनका बौद्धिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक योगदान रहा है। लेकिन कट्टरपंथी सोच और अलगाववादी मानसिकता ने वहां एकपक्षीय धार्मिक पहचान को जबरन स्थापित करने की कोशिश की — और काफी हद तक सफल भी हुए।

जनसंख्या का संतुलन क्यों ज़रूरी है?
कश्मीर घाटी की एकांगी जनसंख्या संरचना केवल सामाजिक असंतुलन का कारण नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी दीर्घकालिक खतरा है। जब घाटी में स्थानीय समर्थन के बल पर विदेशी आतंकवादी शरण पाते हैं, जब ‘ओवर ग्राउंड वर्कर’ आतंकियों को आश्रय एवं सूचनाएं भी देते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या केवल सीमा पार से नहीं, भीतर से भी है।

कश्मीर में एक वर्ग ऐसा है जो आतंकवादियों का खुला समर्थन करता है, और दूसरा वर्ग है जो व्यापार के लिए मीठी-मीठी बातें करता है, शांति के नाम पर मोमबत्तियां जलाकर जुलूस निकालता है। लेकिन यह उनकी दोहरी नीति है — आतंकवाद और व्यापार दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

जो स्थानीय व्यापारी सच में शांति और ईमानदारी से व्यापार करना चाहता है, उसे यह बताना होगा कि कौन लोग आतंकवादियों को समर्थन दे रहे हैं, ताकि उनकी पहचान की जा सके और उन पर कार्रवाई की जा सके। अगर वह सच में ईमानदार है, तो उन्हें अपने आसपास की सच्चाई सरकार को बतानी होगी।

एक ओर मोमबत्तियाँ जलाकर शांति की बातें होती हैं, तो दूसरी ओर उसी मोहल्ले से आतंकवादियों को लॉजिस्टिक मदद मिलती है। ऐसे में अगर कोई यह कहे कि घाटी में आतंकवाद और व्यापार साथ-साथ चल सकते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक भ्रम होगा।

समाधान क्या है?
जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक मात्र विकल्प नहीं है, लेकिन यह सबसे निर्णायक विकल्प ज़रूर है।
सरकार को चाहिए कि वह उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार और अन्य राज्यों के युवाओं, अग्नि वीरों, पूर्व सैनिकों, अर्धसैनिक बलों के रिटायर्ड अधिकारियों, ऐसे लोगों और व्यापारियों को जो अपने व्यापार का विस्तार कश्मीर में करना चाहते हैं तथा राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत नागरिकों को घाटी में पुनर्वासित करने की योजना तैयार करे।
उन्हें:
भूमि, आवास और रोजगार व बैंकों से सुविधाजनक कर्ज की सुविधाएं दी जाएं,

वहां सम्मानजनक जीवन यापन की गारंटी हो,

और एक वर्ष की अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण देकर उन्हें सुरक्षा में भी सहभागी बनाया जाए।

यह रणनीति घाटी में स्थायी शांति और विकास के लिए आधार तैयार करेगी।
क्या यह व्यावहारिक है?

बिलकुल। धारा 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पहली बार भारतीय कानून और नीतियों को समान रूप से लागू करने का अवसर मिला है। निवेश बढ़ रहा है, नौकरियाँ पैदा हो रही हैं — लेकिन अगर इस बदलाव का लाभ केवल एक सीमित समुदाय तक ही रहे, तो ना तो यह लोकतंत्र के सिद्धांतों के हित में होगा और ना ही वहां के व्यापार और उद्योग जगत के सर्वांगीण विकास के लिए उचित होगा | क्योंकि सरकार जितना बड़ा विकास कश्मीर घाटी के लिए करना चाहती है उसके लिए उतने ही संसाधनों की और मानव श्रम की और मानवीय लोगों की जरूरत रहेगी और उसके लिए बाहर के राज्यों के लोगों को वहां विस्थापित करना आवश्यक है जो कि वहां के स्थानीय लोगों के हित में भी रहेगा और व्यापार उद्योग जगत के लोगों के भी हित में रहेगा |

कश्मीर की वास्तविक ‘विकास गाथा’ तब लिखी जाएगी, जब वहां का जनसंख्यिकीय संतुलन भारत के अन्य राज्यों की तरह बहुलतावादी और समावेशी होगा। यह न केवल विस्थापितों के साथ ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी, सुरक्षित और समरस भारत की नींव भी होगी।

सरकार को अब संकोच नहीं, दृष्टिकोण और निर्णय क्षमता दिखाने की ज़रूरत है।
कश्मीर में अगर स्थायी समाधान चाहिए, तो डेमोग्राफिक चेंज ही वो निर्णायक चाबी है, जो दरवाज़ा खोल सकती है — शांति और समरसता का।

धन्यवाद,

सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
पूर्व उपाध्यक्ष , जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड
जयपुर, राजस्थान
suneelduttgoyal@gmail.com

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