भारतीय परिवारों का विखंडन: बाजार, मीडिया और बदलता समाज

परिवारों का टूटना बाजार के हित में है – यह वाक्य पहली नजर में अतिशयोक्ति लग सकता है, लेकिन पिछले तीन दशकों के सामाजिक और आर्थिक आंकड़े इस प्रवृत्ति की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। जब परिवार बिखरते हैं तो बाजार फलता-फूलता है। पहले एक परिवार एक घर खरीदता या बनवाता था। अब एक से अधिक घर खरीदने पड़ते हैं। एक से अधिक कार, एक से अधिक टेलीविजन, एक से अधिक वाशिंग मशीन और ऐसे ही हर वह वस्तु, जो पहले पूरे परिवार के लिए पर्याप्त हुआ करती थी, अब अलग-अलग घरों के लिए आवश्यक हो गई है।

मैंने यह परिवर्तन लगभग दस वर्ष पहले अपने जीवन में बहुत स्पष्ट रूप से महसूस किया था। मेरे जानकार दो भाइयों ने अलग-अलग मकान लिए। एक बड़ा, संयुक्त परिवार का घर। लेकिन जब परिवार बढ़े, तो बंटवारे की कोई बात न होते हुए भी अलग रहने की आवश्यकता महसूस हुई।

अलग घर लेने का अर्थ सिर्फ दीवारें बदलना नहीं था। सारा सामान दोबारा खरीदा गया – नया टीवी, नया फ्रिज, नया कूलर। यहीं मेरे मन में पहली बार एक प्रश्न उठा। जो नया घर था, वहाँ उस समय की सबसे आधुनिक चीज़ें आईं, जबकि माता-पिता के साथ रहने वाले घर में वही पुराना सामान चलता रहा।

यहीं से एक अदृश्य तुलना शुरू होती है। बच्चों के मन में यह भाव पैदा होता है कि “चाचा के घर सब नया है, हमारे घर सब पुराना है।” यह कोई बड़ी लड़ाई नहीं होती, लेकिन यही छोटे-छोटे भाव आगे चलकर मानसिक असंतोष और पारिवारिक खटास का कारण बनते हैं।

आज यही न्यूक्लियर फैमिली संरचना कई बार रिश्तों के टूटने, यहाँ तक कि तलाक़ तक के कारण बनती दिखाई देती है। अलग रहने से स्वतंत्रता तो बढ़ी है – आने-जाने की, रहने-सहने की, निर्णय लेने की – लेकिन इसी स्वतंत्रता के साथ सामाजिक अनुशासन और पारिवारिक निगरानी भी कम हुई है।

सामाजिक दृष्टि से जो आचरण पहले स्वाभाविक रूप से नियंत्रित रहता था, वह अब खुला हो गया है। उदाहरण के तौर पर, घरों में मांसाहार का बढ़ता प्रयोग, शराब और सिगरेट का सामान्य हो जाना – इन प्रवृत्तियों के पीछे न्यूक्लियर फैमिली में रहना भी एक महत्वपूर्ण कारण बनता जा रहा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि संयुक्त परिवार पूर्णतः दोष-मुक्त थे या न्यूक्लियर परिवार पूर्णतः गलत हैं। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि न्यूक्लियर परिवार व्यवस्था के कुछ सामाजिक और मानसिक दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं।

संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर परिवार तक: आंकड़ों की कहानी

भारत की जनगणना (2011) और उसके बाद के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि संयुक्त परिवारों की संख्या में निरंतर गिरावट आई है और न्यूक्लियर परिवारों की संख्या बढ़ी है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) और विभिन्न समाजशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार शहरी भारत में एकल या छोटे परिवारों का प्रतिशत 70% से अधिक हो चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।

रियल एस्टेट सेक्टर के आंकड़े बताते हैं कि महानगरों में 1 बी एच के  और 2 बी एच के  फ्लैट्स की मांग पिछले 20 वर्षों में कई गुना बढ़ी है। ऑटोमोबाइल उद्योग की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के सबसे बड़े दोपहिया और प्रमुख चारपहिया बाजारों में शामिल हो चुका है। उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और होम अप्लायंस सेक्टर की वार्षिक वृद्धि दर 10–15% के आसपास रही है। यह वृद्धि केवल जनसंख्या वृद्धि से नहीं समझी जा सकती; इसके पीछे परिवार संरचना में परिवर्तन भी एक बड़ा कारण है।

पहले संयुक्त परिवारों में एक ही मिक्सी, एक ही गीजर, एक ही वाशिंग मशीन और सीमित इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से काम चल जाता था। आज अलग-अलग घरों में वही सभी वस्तुएं अलग-अलग खरीदी जा रही हैं। परिणामस्वरूप बाजार में बहार आई, लेकिन समाज और परिवार बिखरते चले गए।

सामाजिक सुरक्षा का भारतीय मॉडल

संयुक्त परिवार केवल भावनात्मक व्यवस्था नहीं था, वह भारतीय समाज की वास्तविक “सोशल सिक्योरिटी” था। यूरोपीय समाजों में जहां पेंशन, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और वृद्धाश्रम आवश्यक संरचनाएं हैं, भारत में पारिवारिक व्यवस्था ही बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षा कवच थी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू एच ओ ) और भारत के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे (NIMHANS, 2015-16) के अनुसार भारत में हर सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। अकेलापन, अवसाद और चिंता विकारों में वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरीकरण, पारिवारिक विखंडन और सामाजिक अलगाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

पहले संयुक्त परिवारों में पुरुष व्यापार या नौकरी के सिलसिले में बाहर जाते थे, तो घर में बुजुर्ग और अन्य सदस्य परिवार को संभाल लेते थे। महिलाओं को सामाजिक और भावनात्मक सहारा मिलता था। बच्चों का पालन-पोषण सामूहिक रूप से होता था। मनमुटाव होते थे, लेकिन सुलझ भी जाते थे। गली-मोहल्लों की संस्कृति में बच्चे खेलते थे, महिलाएं मिलकर गीत-संगीत करती थीं – आज की भाषा में कहें तो वह “किटी पार्टी” का सहज, सांस्कृतिक रूप था।

मीडिया और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण

1990 के दशक के बाद उपग्रह चैनलों और मनोरंजन उद्योग के विस्तार ने पारिवारिक छवियों को नए ढंग से प्रस्तुत किया। कई लोकप्रिय धारावाहिकों में संयुक्त परिवार को षड्यंत्र, सास-बहू के झगड़े, अविश्वास और व्यक्तिगत इच्छाओं के दमन के रूप में दिखाया गया। इसके विपरीत न्यूक्लियर परिवार को आधुनिकता, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।

यह केवल सांस्कृतिक बदलाव नहीं था; यह उपभोक्ता व्यवहार में परिवर्तन का भी आधार बना। विज्ञापन उद्योग ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को व्यक्तिगत उपभोग से जोड़ा। “अपना घर”, “अपनी कार”, “अपनी लाइफस्टाइल” – ये स्लोगन केवल भावनात्मक अपील नहीं थे, बल्कि बाजार रणनीति का हिस्सा थे।

शिक्षा, करियर और विलंबित मातृत्व

भारतीय शिक्षण संस्थानों का व्यावसायीकरण भी इस परिवर्तन का एक आयाम है। निजी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों की फीस में पिछले दो दशकों में कई गुना वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 से नीचे आ चुकी है। शहरी शिक्षित वर्ग में विवाह और मातृत्व की आयु बढ़ी है।

नई पीढ़ी करियर, आर्थिक स्थिरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे रही है। परिणामस्वरूप एक या बिना संतान वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है। इससे रिश्तों का विस्तार – मामा-मामी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई , बुआ – फूफा स्वाभाविक रूप से सीमित हो गया है। रिश्तों का संसार “अंकल” और “आंटी” तक सिमटता जा रहा है।

डिजिटल युग और अकेलापन

बच्चों के संस्कार अब केवल माता-पिता या दादा-दादी तय नहीं कर रहे; सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल कंटेंट भी प्रभाव डाल रहे हैं। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ से अधिक हो चुकी है। औसतन भारतीय युवा प्रतिदिन 4–5 घंटे मोबाइल पर बिताता है।

धीरे-धीरे सुख-दुख के रिश्ते भी समाप्त होने को हैं। बच्चों के संस्कार माता-पिता या दादा-दादी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर तय कर रहे हैं। पहले जो काम दादा-दादी या परिवार के बड़े सदस्य करते थे, वह अब काउंसलर्स करने लगे हैं। बाजार के लिए यह एक आदर्श स्थिति है। हमारी हर समस्या उनके लिए एक प्रोडक्ट है। हमारी हर भावनात्मक आवश्यकता के लिए कोई-न-कोई ऐप है। हर त्यौहार का मतलब है ढेर सारा ऑनलाइन ऑर्डर, चाहे वह सामान काम का हो या न हो। ढेर सारे सब्सक्रिप्शन हमारे पास हैं, जो हर तरह के चाहे-अनचाहे संस्कार हमें बांट रहे हैं। “मात्र दो दशक के अंदर हमारा समाज पूरी तरह से बदल गया और यह प्रश्न खड़ा होने लगा कि हम क्या से क्या हो गए। हम कहां से चले और कहां पहुंच गए, और जहां पहुंचे हैं, क्या वहीं पहुँचना जरूरी था या कोई और अच्छा तरीका भी हो सकता था?”

उपभोग संस्कृति और त्योहार

त्योहारों का स्वरूप भी बदला है। ई-कॉमर्स कंपनियों की “फेस्टिव सेल” अरबों रुपये का कारोबार करती हैं। दिवाली, होली या अन्य पर्व अब बड़े पैमाने पर ऑनलाइन शॉपिंग और ब्रांडेड उपहारों से जुड़ गए हैं।

प्रश्न यह है कि क्या यह परिवर्तन अनिवार्य था? क्या दिवाली की खुशी अब केवल ऑनलाइन ऑर्डर से मापी जाएगी? क्या जंक फूड मां के हाथ के खाने से अधिक आकर्षक हो जाएगा? क्या दादी-नानी की कहानियों की जगह नेटफ्लिक्स , यूट्यूब  और इंस्टाग्राम के वीडियो ले लेंगे?

लैंगिक भूमिकाएं और सामाजिक परिवर्तन

समाज में महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक भागीदारी बढ़ी है, जो सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ जीवनशैली में भी बदलाव आया है। शराब और धूम्रपान जैसे व्यवहार, जो पहले सीमित थे, अब लैंगिक सीमाओं से परे बढ़ रहे हैं। यह परिवर्तन केवल नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी विषय है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में अल्कोहल उपभोग में वृद्धि दर्ज की गई है। सार्वजनिक विमर्श में “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की अवधारणा ने पारिवारिक अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी के पारंपरिक मॉडल को चुनौती दी है।

आगे का मार्ग

यह आवश्यक नहीं कि संयुक्त परिवार ही एकमात्र आदर्श मॉडल हो। आधुनिक जीवन, शहरी रोजगार और गतिशीलता के अपने व्यावहारिक कारण हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि परिवार के विखंडन के सामाजिक और मानसिक प्रभावों पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।

संयुक्त परिवार को बोझ नहीं, संपत्ति के रूप में देखने की आवश्यकता है। बुजुर्गों का सम्मान केवल सांस्कृतिक मूल्य नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार है। बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारवान नागरिक बनाने की दिशा में प्रयास होना चाहिए।

त्योहारों को भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई के साथ मनाना चाहिए, न कि केवल उपभोग के अवसर के रूप में। बाजार जीवन का हिस्सा है, लेकिन जीवन का केंद्र नहीं होना चाहिए।

आज प्रश्न यह नहीं कि हम आधुनिक क्यों बने; प्रश्न यह है कि क्या आधुनिकता के नाम पर हमने अपनी सामूहिक शक्ति को कमजोर कर दिया? क्या हम आर्थिक प्रगति और पारिवारिक एकता के बीच संतुलन नहीं बना सकते? 

यदि हम अभी नहीं रुके, तो अगली पीढ़ी को संयुक्त परिवार का अर्थ समझाना भी कठिन हो जाएगा। समय आ गया है कि हम विकास और मूल्य – दोनों को साथ लेकर चलने की नई सामाजिक रणनीति बनाएं। यही संतुलन भारत की वास्तविक शक्ति रहा है, और भविष्य में भी वही हमारी स्थिरता का आधार बन सकता है।

रोटेरियन सुनील दत्त गोयल
एडवाइजर, एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री,
पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड, जयपुर, राजस्थान
मेंबर, रोटरी क्लब जयपुर सिटीजन (RID3056)
suneelduttgoyal@gmail.com

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