पाकिस्तान के विदेश मंत्री श्री ख्वाजा आसिफ का एक इन्टरव्यू उक्त समाचार पत्र में छपा। मुझे अफसोस है कि हमारे समाचार पत्र ने इस प्रकार के एक आपत्तिजनक इन्टरव्यू को अपने अखबार में प्रमुखता से छापा। मेरा ऐसा मानना है कि हमारे देश के अखबारों को इस प्रकार की विवादास्पद खबरें जो कि हमारे देश की आन्तरिक नीति में दखलंदाजी करती हों और न्यायालय के आदेशों पर प्रश्न चिन्ह लगाती हों को प्रकाशित करने से बचना चाहिए।

पहले तो मैं श्रीमान आसिफ साहब को निवेदन कर दूँ कि उन्हें अपने देश की समस्याओं को सुलझाने में अपना वक्त लगाना चाहिए। उन्हें भारत के आन्तरिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। दूसरा उनकी यह टिप्पणी भारत की स्वतन्त्र न्यायपालिका के फैंसले को कटघरें में खडी करती है। तीसरा मुझे ऐसा लगता है कि यह न्यायपालिका के आदेश की अवमानना है। मैं आशा करता हूँ कि कोई ना कोई अधिवक्ता बन्धू इस मुद्दे को न्यायालय के प्रसंज्ञान में लाएगें।

हो सकता है कि पाकिस्तान के अदालतों / सरकारों के फैंसले जाति या धर्म के आधार पर होते हों। श्रीमान् आसिफ साहब को विवादास्पद टिप्पणी करने से पहले यदि वे अपने विवेक का जरा भी इस्तेमाल करते और अदालत के फैंसले को पढ़ने की जहमत करते तो उन्हें समझ में आता कि सैफ अली खान एवं तब्बू दोनों मुस्लिम हैं और इस मुकदमें से बरी किये गये हैं। सत्ताधारी दल के ऊपर आरोप लगाने का मतलब है कि शायद इनकी सरकार भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार से घबराती है।

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